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          जबह करने का तरीका


          तम्बीहः- कुर्बानी के मसाइल तफ़सील के साथ मजकूर होचुके अब मुख्तसर तौर पर इरा का तरीका बयान किया जाता है ताकि अवाम के लिये आसानी हो । कुर्बानी का जानवरं उन शराइत के मुवाफिक हो जो मजकूर हुए यानी जो इस की उम्र बताई गई उस से कम न हो और उन ऐब से पाक हो जिनकी वजह से कुर्बानी ना जाइज़ होती है और बेहतर यह कि उमदा और फरबा हो । कुर्बानी से पहले उसे चारा पानी देदें यानी भूका प्यासा जबह न करें । और एक के सामने दूसरे को न जबह करें और पहले से छुरी तेज कर लें ऐसा न हो कि जानवर गिराने के बाद उसके सामने छुरी तेज़ की जाये जानवर को बायें पहलू पर इस तरह लिटायें कि किब्ला को उस का मुँह और अपना दाहिना पाँव उसके पहलू पर रखकर तेज़ छुरी से जल्द जबह कर दिया जाये और ज़बह से पहले यह दुआ पढ़ी जाये ।

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          जबह करने की दुआ

           اِنِّیْ وَجَّهْتُ وَجْهِیَ لِلَّذِیْ فَطَرَ السَّمٰوٰتِ وَ الْاَرْضَ حَنِیْفًا وَّ مَاۤ اَنَا مِنَ الْمُشْرِكِیْنَ وَ نُسُكِیْ وَ مَحْیَایَ وَ مَمَاتِیْ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِیْنَ لَا شَرِیْكَ لَهٗۚ-وَ بِذٰلِكَ اُمِرْتُ وَ اَنَا اَوَّلُ الْمُسْلِمِیْنَ اَللّٰھُمَّ لَکَ وَمِنْکَ بِسْمِ اللّٰہِ اَللّٰہُ اَکْبَرُ

          तर्जमा : - " मैंने अपना मुँह उसकी तरफ किया जिस ने आसमान और जमीन बनाये , एक उसी का होकर , और मैं मुश्रिकों में नहीं बेशक मेरी नमाज और मेरी कुर्बानियाँ और मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिये है जो रब सारे जहान का , उसका कोई शरीक नहीं , मुझे यही हुक्म है और मैं मुसलमानों में हूँ ऐ अल्लाह ! तेरे ही लिये और तेरी दी हुई तौफीक से अल्लाह के नाम से शुरू अल्लाह सबसे बड़ा है । इसे पढ़कर जबह करदे कुर्बानी अपनी तरफ़ से हो तो जबह के बाद यह दुआ पढ़े ।

          जबह करने के बाद की दुआ 

          اَللّٰھُمَّ تَقَبَّلَ مِنِّی کَمَا تَقَبَّلْتَ مِنْ خَلِیْلِکَ اِبْرَاھِیْمَ عَلَیْہِ السَّلَامُ وَحَبِیْبِکَ مُحَمَّدٍ(صلَّی اللّٰہ تعالٰی علیہ وسلَّم۔)

          ऐ अल्लाह ! तू मुझ से ( इस कुर्बानी को ) कबूल करमा जैसे तूने अपने खलील इब्राहीम अलैहिस्सलाम और अपने हबीय मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कबूल फरमाई

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